Types of Wire and Cable Joint Uses in Hindi

विद्युत कार्य (Types of Wise joints in hindi) में विभिन्न प्रकार के छोड़ आवश्यकतानुसार प्रयुक्त होते हैं एक जोड़ द्वारा दी गई सेवा से जोड़ का उपयोग में आने वाला प्रकार ज्ञात होता है कुछ चालकों (Joints in Hindi) के जोड़ों में श्रेष्ठ विद्युत चालकता आवश्यकता होती है जबकि यांत्रिक मजबूती आवश्यक नहीं है उदाहरण के लिए संधि बॉक्स और कंडक्ट साधन में निर्मित जोड़ सिरोपरी लाइनों के चालक में निर्मित जोड़ विद्युत रूप से चालक होने चाहिए तथा निलंबित चालक के भर और वायु दाब के कारण तनाव को सहन करने के लिए यांत्रिक रूप से सिदिध होना चाहिए

Types of Wire and Cable Joint Types & Uses in Hindi

विद्युत तार जोड़ने के प्रकार

जब हम “वायर जॉइंट” या “स्प्लाइस (splice)” की बात करते हैं, तो इसका मतलब होता है —
दो या उससे अधिक कंडक्टर (तारों) को इस तरह जोड़ना कि विद्युत धारा बिना रुकावट एक तार से दूसरे में प्रवाहित हो सके।

एक अच्छे जॉइंट की विशेषताएँ

किसी भी तार जोड़ (joint) को बनाते समय यह बातें हमेशा ध्यान रखें:

  1. अच्छा विद्युत संपर्क (Good Electrical Contact)
    जोड़ इस तरह होना चाहिए कि बिजली आसानी से बहे, रुकावट न हो और तार ढीले न हों।
  2. यांत्रिक मजबूती (Mechanical Strength)
    जोड़ इतना मजबूत हो कि हल्का खिंचाव या वाइब्रेशन आने पर टूटे नहीं।
  3. इंसुलेशन / सुरक्षा (Proper Insulation)
    जोड़ने के बाद उसे टेप या हीट-श्रिंक ट्यूब से ढकें ताकि शॉर्ट सर्किट न हो।
  4. जंग से सुरक्षा (Corrosion Protection)
    अगर जोड़ नमी वाले स्थान पर है तो उसे सोल्डर या विशेष सीलिंग से सुरक्षित करें।
  5. बिजली सुरक्षा नियमों के अनुसार (As per Electrical Codes)
    कुछ देशों/राज्यों में केवल ट्विस्ट और टेप करना गैरकानूनी माना जाता है। सही कनेक्टर या जंक्शन बॉक्स का प्रयोग करें।

विद्युत तार जोड़ने के प्रकार (Types of Wire Joints)

क्रमजॉइंट का नामउपयोग / विशेषताबनाने की विधि (Steps)टिप्पणी
1. स्ट्रेट ट्विस्ट जॉइंट (Straight Twist Joint)इसे स्ट्रेट स्प्लाइस या बट जॉइंट भी कहते हैंदो तारों को एक सीधी लाइन में जोड़ने के लिए① दोनों तारों की इंसुलेशन ~20–30 मिमी तक छीलें ② तारों को बराबर रखें और एक-दूसरे के साथ मरोड़ें (4–8 बार) ③ चाहें तो सोल्डर करें ④ टेप या हीट-श्रिंक से ढकेंआसान तरीका है, पर यांत्रिक रूप से कमजोर होता है
2. रैट-टेल स्प्लाइस (Rat Tail Splice / Pig Tail)कई तारों को एक साथ जोड़ने के लिए (जंक्शन बॉक्स में)① सभी तारों की इंसुलेशन छीलें ② सबको एक साथ पकड़कर मरोड़ें ③ चाहें तो सोल्डर करें ④ इंसुलेट करेंघरों की वायरिंग में सबसे आम तरीका
3. वेस्टर्न यूनियन स्प्लाइस (Western Union Joint)मजबूत जोड़ के लिए① तारों को क्रॉस करें ② दोनों सिरों को एक-दूसरे के चारों ओर 6–8 बार लपेटें ③ सोल्डर करें ④ इंसुलेट करेंलंबी दूरी के तारों या फोन वायर में प्रयोग
4. टैप स्प्लाइस (T-Joint)मुख्य तार से शाखा निकालने के लिए① मुख्य तार का इंसुलेशन बीच से 25 मिमी तक निकालें ② ब्रांच वायर का सिरा छीलें ③ उसे मुख्य तार के चारों ओर 6–8 बार लपेटें ④ सोल्डर करें व इंसुलेट करें“T” आकार का जोड़ बनता है
5. ब्रिटानिया जॉइंट (Britannia Joint)अर्थिंग (ग्राउंड वायर) के लिए① मुख्य तार का कुछ हिस्सा छीलें ② दूसरा तार उससे जोड़कर लपेटें ③ सोल्डर करें ④ ढकें या सुरक्षित करेंअर्थिंग पॉइंट्स पर उपयोग
6. क्रिम्प या लॉक जॉइंट (Crimp / Lock Joint)क्रिम्पिंग टूल और कनेक्टर से① तारों को छीलें ② क्रिम्प स्लीव में डालें ③ क्रिम्प टूल से दबाएं ④ टेप या श्रिंक लगाएंऔद्योगिक और ऑटोमोबाइल वायरिंग में उपयोगी
7. केबल जॉइंट (Cable Joint for Power Cables)मोटे या भूमिगत तारों के लिएइसमें स्ट्रेट, टी, या ट्रांजिशन जॉइंट होते हैं इंसुलेशन, हीट-श्रिंक, रेज़िन आदि का प्रयोगउच्च वोल्टेज और भारी पावर के लिए
8. हीट-श्रिंक / कोल्ड-श्रिंक जॉइंटनमी और मौसम से सुरक्षा के लिए① जोड़ने के बाद ट्यूब चढ़ाएं ② हीट या कोल्ड-श्रिंक से सील करेंआउटडोर या भूमिगत तारों में

हर जोड़ बनाने की विधि (Step-by-Step in Hindi)

1️⃣ स्ट्रेट ट्विस्ट जॉइंट (straight Twist Joint) बनाने की विधि:

straight Twist Joint
  1. बिजली बंद करें।
  2. दोनों तारों का इंसुलेशन 25 मिमी तक छीलें।
  3. तारों को पास लाएं और एक-दूसरे के साथ मरोड़ें।
  4. चाहें तो सोल्डर करें।
  5. इंसुलेटिंग टेप या हीट-श्रिंक से ढक दें।

स्ट्रेट ट्विस्ट जॉइंट (Straight Twist Joint) के उपयोग

स्ट्रेट ट्विस्ट जॉइंट दो तारों को एक सीधी रेखा में जोड़ने के लिए बनाया जाता है।
इसका उपयोग तब किया जाता है जब दो विद्युत तारों की लंबाई बढ़ानी हो या किसी कटे हुए तार को दोबारा मरम्मत (repair) करनी हो।
यह जोड़ सरल, सस्ता और जल्दी बनने वाला होता है।


स्ट्रेट ट्विस्ट जॉइंट के प्रमुख उपयोग (Main Uses):

  1. तार की लंबाई बढ़ाने में (Extension of Wire Length):
    जब किसी वायर को लंबा करना होता है, तब दो तारों को इस जोड़ से जोड़कर उसकी लंबाई बढ़ाई जाती है।
  2. कटे हुए तार को जोड़ने में (Repairing Broken Wires):
    अगर कोई तार बीच से टूट जाए या कट जाए, तो दोनों सिरों को साफ करके स्ट्रेट ट्विस्ट जॉइंट से दोबारा जोड़ा जाता है।
  3. घरों की सामान्य वायरिंग में (Domestic Wiring):
    घरेलू विद्युत फिटिंग, लाइटिंग या पंखे की वायरिंग में इसका उपयोग अक्सर किया जाता है,
    जहाँ कम वोल्टेज और हल्का लोड होता है।
  4. टेम्पररी कनेक्शन में (Temporary Electrical Connections):
    अस्थायी विद्युत कनेक्शन या टेस्टिंग के दौरान यह जोड़ बहुत उपयोगी होता है क्योंकि इसे जल्दी बनाया जा सकता है।
  5. कम वोल्टेज वाले सर्किट में (Low Voltage Circuits):
    जैसे — बेल वायर, टेलीफोन वायर, छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की वायरिंग आदि में।

फायदे (Advantages):

  • बनाना आसान और तेज़।
  • बहुत कम सामग्री की आवश्यकता।
  • बिना किसी खास टूल के बनाया जा सकता है।

नुकसान (Disadvantages):

  • यह जोड़ मैकेनिकल रूप से कमजोर होता है।
  • केवल लो वोल्टेज और लो करेंट सर्किट के लिए उपयुक्त है।
  • ज्यादा खिंचाव या कंपन (vibration) होने पर ढीला पड़ सकता है।

स्ट्रेट ट्विस्ट जॉइंट एक साधारण लेकिन उपयोगी जोड़ है,
जो छोटे घरेलू सर्किट, अस्थायी कनेक्शन और वायर एक्सटेंशन के लिए सबसे उपयुक्त होता है।
यह जोड़ तभी सुरक्षित होता है जब इसे ठीक से टाइट करके और इंसुलेटिंग टेप से ढक दिया जाए।


2️⃣ Rat Tail (Pig Tail) Joint :

Rat Tail (Pig Tail) Joint
  1. बिजली बंद करें।
  2. 2 या अधिक तारों की इंसुलेशन छीलें।
  3. सभी को एक साथ पकड़ें और मरोड़ें।
  4. सोल्डर करें (यदि आवश्यक हो)।
  5. टेप या स्प्लाइस-कैप से ढकें।

पिग टेल जॉइंट के प्रमुख उपयोग (Main Uses):

  1. घरों की वायरिंग में (Domestic Wiring):
    यह सबसे अधिक घरों और बिल्डिंग की जंक्शन बॉक्स (Junction Box) वायरिंग में उपयोग किया जाता है,
    जहाँ कई तारों को एक साथ जोड़कर एक ही सर्किट बनाया जाता है — जैसे स्विच, बल्ब या पंखे के कनेक्शन में।
  2. ब्रांच सर्किट (Branch Circuits):
    जब एक मुख्य तार से कई ब्रांच निकलनी हों,
    तो सभी ब्रांच तारों को मुख्य तार के साथ मरोड़कर पिग टेल जॉइंट बनाया जाता है।
  3. टेस्टिंग या अस्थायी कनेक्शन (Testing or Temporary Connections):
    अस्थायी या जल्दी कनेक्शन के लिए यह जोड़ बहुत सुविधाजनक होता है।
  4. लाइटिंग सर्किट में (Lighting Circuits):
    जहाँ एक ही स्विच से कई लाइट या फैन चलाने होते हैं, वहाँ यह जोड़ बहुत आम है।

फायदे (Advantages):

  • बनाना आसान और तेज़।
  • एक साथ कई तारों को जोड़ने के लिए उपयुक्त।
  • ज्यादा सामग्री की ज़रूरत नहीं होती (सिर्फ़ प्लायर और टेप)।
  • अच्छे संपर्क (Good Electrical Contact) के लिए सोल्डर भी लगाया जा सकता है।

नुकसान (Disadvantages):

  • मैकेनिकल मजबूती (Mechanical Strength) कम होती है।
  • अगर जोड़ को ठीक से इंसुलेट नहीं किया गया, तो शॉर्ट सर्किट का खतरा रहता है।
  • केवल लो वोल्टेज सर्किट (Low Voltage Circuits) के लिए उपयुक्त है।
  • तारों पर ज़्यादा खिंचाव या झटका आने पर जोड़ ढीला हो सकता है।

सावधानियाँ (Precautions):

  • सभी तारों की इंसुलेशन 2–3 सेमी तक साफ करके समान लंबाई में छीलें।
  • मरोड़ने से पहले तारों के सिरों को ठीक से सीधा करें।
  • जोड़ने के बाद इंसुलेटिंग टेप या हीट श्रिंक ट्यूब से जोड़ को अच्छी तरह ढकें।
  • अगर जोड़ स्थायी होना है तो सोल्डरिंग (Soldering) करें।

पिग टेल जॉइंट एक सामान्य और सुविधाजनक जोड़ है,
जो घरेलू वायरिंग, ब्रांच सर्किट और जंक्शन बॉक्स में सबसे अधिक उपयोग होता है।
यह जोड़ केवल कम वोल्टेज सर्किट के लिए उपयुक्त है और इसे हमेशा इंसुलेशन से ढकना चाहिए ताकि सुरक्षा बनी रहे।


3️⃣ Western Union Joint:

Western Union Joint
  1. दोनों तारों का सिरा छीलें।
  2. उन्हें क्रॉस करें।
  3. दोनों सिरों को 6–8 बार लपेटें।
  4. सोल्डर करें और टेप लगाएं।
    👉 यह जोड़ बहुत मजबूत होता है।

वेस्टर्न यूनियन जॉइंट के प्रमुख उपयोग (Main Uses):

  1. लंबे तारों को जोड़ने में (Joining Long Wires):
    यह जोड़ मुख्य रूप से उन तारों में उपयोग किया जाता है जो लंबी दूरी तक फैले होते हैं, जैसे — टेलीग्राफ, टेलीफोन या डेटा लाइन्स।
  2. लाइन वायरिंग में (Line Wiring):
    ओवरहेड लाइन या पोल वायरिंग में इसका उपयोग किया जाता है क्योंकि यह जोड़ मैकेनिकल रूप से बहुत मजबूत होता है।
  3. स्थायी विद्युत जोड़ (Permanent Electrical Connections):
    जहाँ जोड़ को बार-बार नहीं खोलना होता, वहाँ यह सबसे विश्वसनीय विकल्प है।
  4. कम झटके और कंपन वाले सर्किट (Stable Circuits):
    यह जोड़ उन सर्किट्स में उपयोग किया जाता है जहाँ कंपन (vibration) या बार-बार हिलना नहीं होता।
  5. सोल्डरिंग के साथ प्रयोग (Soldered Permanent Joints):
    वेस्टर्न यूनियन जॉइंट को सोल्डरिंग के साथ मिलाकर उपयोग करने पर यह लगभग स्थायी जोड़ बन जाता है, जो वर्षों तक टिकता है।

फायदे (Advantages):

  1. अत्यधिक मजबूती (High Mechanical Strength):
    यह जोड़ खींचने पर ढीला नहीं होता, बल्कि और मजबूत हो जाता है।
  2. बेहतर विद्युत संपर्क (Good Electrical Conductivity):
    कसकर लिपटने के कारण तारों का सतही संपर्क बढ़ता है, जिससे करंट आसानी से बहता है।
  3. लंबी लाइनों के लिए उपयुक्त (Ideal for Long Lines):
    दूर-दराज के कनेक्शन या सिग्नल वायरिंग में यह जोड़ सबसे उपयुक्त होता है।
  4. टिकाऊ और सुरक्षित (Durable and Safe):
    एक बार ठीक से बना लेने पर यह जोड़ वर्षों तक स्थायी रहता है।

⚠️ नुकसान (Disadvantages):

  1. बनाने में समय लगता है (Time-Consuming):
    यह जोड़ साधारण ट्विस्ट या पिग टेल की तुलना में थोड़ा जटिल और समय लेने वाला होता है।
  2. कौशल की आवश्यकता (Requires Skill):
    इसे सही तरीके से बनाने के लिए इलेक्ट्रिशियन को सही तकनीक पता होनी चाहिए।
  3. सोल्डरिंग जरूरी (Solder Recommended):
    बिना सोल्डर के यह जोड़ खुल सकता है या समय के साथ ढीला पड़ सकता है।
  4. लचीले तारों के लिए उपयुक्त नहीं (Not for Stranded Wires):
    यह केवल सॉलिड कंडक्टर (Solid Copper Wire) के लिए उपयुक्त होता है, न कि मल्टी-स्ट्रैंड तारों के लिए।

सावधानियाँ (Precautions):

  • तारों को जोड़ने से पहले 8–10 सेंटीमीटर तक इंसुलेशन हटाएँ।
  • दोनों सिरों को क्रॉस (X) में रखकर लपेटें।
  • प्रत्येक सिरे को दूसरे के चारों ओर 5–6 बार कसकर घुमाएँ।
  • यदि जोड़ स्थायी रखना है तो सोल्डरिंग (Soldering) ज़रूर करें।
  • जोड़ने के बाद इंसुलेटिंग टेप या हीट श्रिंक ट्यूब से कवर करें।

वेस्टर्न यूनियन जॉइंट एक अत्यंत मजबूत और टिकाऊ जोड़ है,
जो लंबे और स्थायी कनेक्शनों के लिए सबसे उपयुक्त है।
यह न केवल विद्युत दृष्टि से सुरक्षित है, बल्कि मैकेनिकल रूप से भी बहुत मजबूत होता है।
इसलिए यह जोड़ टेलीफोन, टेलीग्राफ, लाइन वायरिंग और स्थायी विद्युत इंस्टॉलेशन में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।


4️⃣ टी-जॉइंट (T Joint):

टी-जॉइंट (T Joint)
  1. मुख्य तार का बीच वाला इंसुलेशन छीलें।
  2. ब्रांच तार का सिरा छीलें।
  3. उसे मुख्य तार के चारों ओर लपेटें।
  4. सोल्डर करें और इंसुलेट करें।
    👉 इसका उपयोग नई लाइन निकालने के लिए होता है।

टी-जॉइंट के प्रमुख उपयोग (Main Uses):

  1. ब्रांच कनेक्शन बनाने में (Creating Branch Connections):
    यह जोड़ सबसे अधिक तब उपयोग किया जाता है जब किसी मुख्य लाइन से दूसरी लाइन या शाखा निकालनी हो,
    जैसे किसी सर्किट में एक अतिरिक्त बल्ब, पंखा या सॉकेट जोड़ना।
  2. घरों की वायरिंग में (Domestic Wiring):
    घरों की जंक्शन बॉक्स वायरिंग या लाइटिंग पॉइंट्स में इसका बहुत उपयोग होता है।
  3. ओवरहेड लाइन में (Overhead Distribution Lines):
    जब मुख्य तार (जैसे एल्युमिनियम कंडक्टर) से कोई सप्लाई लाइन नीचे उतारनी हो, तो टी-जॉइंट का उपयोग किया जाता है।
  4. इलेक्ट्रिकल रिपेयर और एक्सटेंशन में (Repairs and Extensions):
    किसी मौजूदा सर्किट में नया डिवाइस या पॉइंट जोड़ने के लिए भी यह जोड़ बहुत उपयोगी है।

फायदे (Advantages):

  1. ब्रांच जोड़ने में आसान (Easy to Create Branches):
    मुख्य तार को बिना काटे नई शाखा जोड़ने का सबसे सरल तरीका।
  2. कम सामग्री में बनता है (Economical and Simple):
    इसके लिए केवल थोड़ा इंसुलेशन हटाना और एक साधारण टर्निंग प्लायर पर्याप्त होता है।
  3. कम समय में बनता है (Quick to Make):
    यह जोड़ कुछ ही मिनटों में बनाया जा सकता है।
  4. लो-वोल्टेज सर्किट के लिए उपयुक्त (Ideal for Low Voltage Circuits):
    घरेलू वायरिंग और छोटे उपकरणों के सर्किट में यह बहुत उपयोगी है।

नुकसान (Disadvantages):

  1. मैकेनिकल मजबूती कम (Less Mechanical Strength):
    यह जोड़ ज्यादा खिंचाव या कंपन (vibration) सहन नहीं कर पाता।
  2. सही इंसुलेशन जरूरी (Proper Insulation Needed):
    अगर जोड़ को सही से टेप या श्रिंक ट्यूब से नहीं ढका गया, तो शॉर्ट सर्किट हो सकता है।
  3. सिर्फ़ हल्के लोड के लिए उपयुक्त (For Light Loads Only):
    यह जोड़ भारी करंट या इंडस्ट्रियल वायरिंग के लिए उपयुक्त नहीं है।
  4. गलत लपेटने पर ढीला जोड़ (Loose Joint Risk):
    अगर शाखा तार को ठीक से नहीं लपेटा गया, तो विद्युत संपर्क ढीला पड़ सकता है।

सावधानियाँ (Precautions):

  • मुख्य तार का इंसुलेशन लगभग 2–3 सेमी तक हटाएँ।
  • शाखा तार का सिरा साफ और सीधा करें।
  • शाखा तार को मुख्य तार के खुले हिस्से पर 6–8 बार कसकर लपेटें।
  • यदि जोड़ स्थायी हो, तो सोल्डरिंग करें ताकि विद्युत संपर्क मज़बूत बने।
  • जोड़ने के बाद इंसुलेटिंग टेप या हीट-श्रिंक ट्यूब से जोड़ को अच्छी तरह ढकें।

टी-जॉइंट एक सरल और व्यावहारिक जोड़ है
जो मुख्य तार से नई शाखा निकालने के लिए सबसे उपयुक्त होता है।
यह जोड़ छोटे घरेलू सर्किट, लाइटिंग इंस्टॉलेशन और टेस्ट कनेक्शन में अक्सर उपयोग होता है।
हालांकि, यह जोड़ केवल लो-वोल्टेज सर्किट के लिए उपयुक्त है और इसे हमेशा अच्छे इंसुलेशन के साथ सुरक्षित किया जाना चाहिए।


5️⃣ ब्रिटानिया जॉइंट (Britannia joint):

ब्रिटानिया जॉइंट (britannia joint)
  1. मुख्य तार को बीच से छीलें।
  2. दूसरा तार जोड़ें और कसकर लपेटें।
  3. सोल्डर करें।
  4. जरूरत हो तो इंसुलेट करें।
    👉 अर्थिंग लाइन जोड़ने में उपयोग।

ब्रिटानिया जॉइंट के प्रमुख उपयोग (Main Uses):

  1. भारी तारों को जोड़ने में (Joining Heavy Conductors):
    जब दो मोटे या सॉलिड कंडक्टर तारों को जोड़ना हो,
    तब ब्रिटानिया जॉइंट का उपयोग किया जाता है क्योंकि यह जोड़ अधिक मजबूत होता है।
  2. अर्थिंग कनेक्शन (Earthing Connections):
    यह जोड़ अक्सर अर्थ वायर (Ground Wire) को जोड़ने के लिए उपयोग किया जाता है,
    क्योंकि यह स्थायी और कम रेसिस्टेंस वाला जोड़ बनाता है।
  3. उच्च वोल्टेज सर्किट (High Voltage Circuits):
    जहाँ करंट अधिक हो और जोड़ पर अधिक भार पड़े,
    वहाँ ब्रिटानिया जॉइंट अन्य जोड़ की तुलना में अधिक टिकाऊ और सुरक्षित होता है।
  4. केबल रिपेयरिंग (Cable Repairing):
    जब किसी मोटे केबल में खराबी या ब्रेक आ जाए,
    तो उसे स्थायी रूप से जोड़ने के लिए इस प्रकार का जोड़ किया जाता है।

फायदे (Advantages):

  1. अत्यधिक मजबूती (High Mechanical Strength):
    इस जोड़ की पकड़ बहुत मजबूत होती है, जिससे यह भारी तारों के लिए उपयुक्त है।
  2. बेहतर विद्युत संपर्क (Good Electrical Conductivity):
    बाइंडिंग वायर कसकर लपेटा जाता है जिससे करंट का प्रवाह बिना रुकावट होता है।
  3. स्थायी जोड़ (Permanent Joint):
    यह जोड़ लंबे समय तक स्थायी रहता है, इसलिए अर्थिंग या लाइन वायर में उपयोगी है।
  4. कंपन-प्रतिरोधी (Vibration Resistant):
    यह जोड़ कंपन (vibration) या झटकों से ढीला नहीं होता।

नुकसान (Disadvantages):

  1. समय अधिक लगता है (Time-Consuming):
    इसमें कई चरणों में लपेटना और सोल्डर करना पड़ता है, इसलिए समय लगता है।
  2. कौशल की आवश्यकता (Requires Skill):
    सही तकनीक से लपेटना और सोल्डरिंग करना ज़रूरी है,
    अन्यथा जोड़ कमजोर हो सकता है।
  3. छोटे तारों के लिए उपयुक्त नहीं (Not for Thin Wires):
    यह जोड़ मोटे सॉलिड कंडक्टर के लिए उपयुक्त है, छोटे तारों में नहीं।
  4. सोल्डरिंग आवश्यक (Soldering Needed):
    बिना सोल्डर के यह जोड़ लंबे समय तक स्थायी नहीं रहता।

सावधानियाँ (Precautions):

  1. दोनों तारों का इंसुलेशन 8–10 सेंटीमीटर तक हटाएँ।
  2. तारों के सिरों को एक-दूसरे के सामने सीधी रेखा में रखें।
  3. एक पतले बाइंडिंग तार से दोनों सिरों पर 4–5 टर्न लपेटें।
  4. फिर पूरे जोड़ पर एक लंबा पतला तार लेकर 10–15 टर्न कसकर लपेटें।
  5. जोड़ पूरा होने पर उस पर सोल्डरिंग करें ताकि स्थायी और चालक (Conductive) संपर्क बने।
  6. जोड़ को सूखने के बाद इंसुलेशन टेप या हीट-श्रिंक ट्यूब से कवर करें।

ब्रिटानिया जॉइंट एक अत्यंत मजबूत, सुरक्षित और स्थायी जोड़ है,
जो मोटे कंडक्टरों, अर्थिंग कनेक्शन और उच्च वोल्टेज सर्किट के लिए उपयोग किया जाता है।
यह जोड़ करंट प्रवाह को सुचारू बनाए रखता है और खिंचाव या कंपन के बावजूद स्थिर रहता है।
इसे सही तकनीक और सोल्डरिंग के साथ करने पर यह सबसे भरोसेमंद जोड़ माना जाता है।


6️⃣ क्रिम्प जॉइंट:

  1. सही साइज का क्रिम्प कनेक्टर लें।
  2. दोनों तारों को डालें।
  3. क्रिम्प टूल से दबाकर जोड़ बनाएं।
  4. चेक करें कि तार ढीला न हो।
  5. टेप या हीट-श्रिंक लगाएं।
    👉 यह सबसे मजबूत और आधुनिक जोड़ माना जाता है।

फायदें और नुकसान (Advantages & Disadvantages)

जॉइंट का प्रकारफायदेनुकसानप्रयोग क्षेत्र
स्ट्रेट ट्विस्टसरल, जल्दी बनता हैकमजोरघरेलू वायरिंग (बॉक्स के अंदर)
रैट-टेलकई तार जोड़ सकते हैंज्यादा मजबूत नहींजंक्शन बॉक्स
वेस्टर्न यूनियनमजबूत और भरोसेमंदथोड़ा कठिनलंबी लाइनें
टी-जॉइंटब्रांच निकालने में आसानखिंचाव से टूट सकता हैब्रांच सर्किट
ब्रिटानियामजबूत ग्राउंड कनेक्शनकम उपयोगअर्थिंग
क्रिम्पबहुत मजबूत और साफटूल चाहिएइंडस्ट्रियल और ऑटो वायरिंग
हीट/कोल्ड श्रिंकवॉटरप्रूफ और सुरक्षितमहंगाआउटडोर या भूमिगत

सावधानियाँ और सुझाव

  • अंत में कंटीन्यूटी और इंसुलेशन टेस्ट करें।
  • हमेशा पावर बंद कर के ही काम करें।
  • सही टूल (वायर स्ट्रिपर, प्लायर, क्रिम्प टूल, सोल्डर आयरन) का प्रयोग करें।
  • तार को काटते समय कंडक्टर को न खरोंचें
  • जोड़ के बाद ढीले तार न रहें
  • यदि जोड़ लोड झेलने वाला है, तो सोल्डर और सपोर्ट जरूर दें।
  • वायरिंग हमेशा बिजली नियमों (IE Code) के अनुसार करें।
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1st angle and 3rd Angle Projection आसान भाषा में

बेसिक समझ – Orthographic Projection क्या है?

किसी 3D ऑब्जेक्ट (त्रिआयामी वस्तु) को जब हम 2D (दो आयाम) में दिखाते हैं,
यानि उसकी लंबाई (Length), चौड़ाई (Width) और ऊँचाई (Height) को अलग-अलग दृश्यों (views) में दिखाते हैं,
तो उसे Orthographic Projection कहते हैं।

इसमें हम मुख्य रूप से 3 views बनाते हैं:

  1. Front View (सामने का दृश्य)
  2. Top View (ऊपर से दृश्य)
  3. Side View (बाएँ या दाएँ का दृश्य)

Principle Planes (मुख्य तल)

Principle Planes (मुख्य तल)

Orthographic projection में दो काल्पनिक plane माने जाते हैं:

  • Vertical Plane (VP) → जिस पर Front View बनती है।
  • Horizontal Plane (HP) → जिस पर Top View बनती है।

इन दोनों के बीच 90° का कोण होता है।
जब हम किसी ऑब्जेक्ट को इन planes के बीच रखते हैं, तो हमें अलग-अलग projection systems मिलते हैं।


Projection Systems के प्रकार

Projection Systems के प्रकार

मुख्य रूप से दो प्रकार के projection systems उपयोग किए जाते हैं:

  1. First Angle Projection (प्रथम कोण प्रक्षेपण)
  2. Third Angle Projection (तृतीय कोण प्रक्षेपण)

(Second और Fourth angle theoretically exist करते हैं पर प्रैक्टिकल में इस्तेमाल नहीं होते।)


1st Angle Projection (प्रथम कोण प्रक्षेपण)

🔹 Concept:

इसमें object को First Quadrant में रखा जाता है,
यानि कि object Vertical Plane और Horizontal Plane दोनों के सामने और ऊपर होता है।

Observer → Object → Plane

मतलब: देखने वाले की नज़र और ड्रॉइंग शीट के बीच object होता है


🔹 View Arrangement (दृश्यों की स्थिति):

View Typeकहाँ बनेगा (Drawing Sheet पर)
Front ViewCenter में (Vertical Plane पर)
Top ViewFront View के नीचे
Right Side ViewFront View के बाएँ

🔹 पहचान का Symbol:

पहचानने के लिए Truncated Cone Symbol (ISO Symbol) होता है —
इसमें बड़ा सर्कल बाएँ और छोटा सर्कल दाएँ होता है।
→ यह बताता है कि यह First Angle Projection है।


3rd Angle Projection (तृतीय कोण प्रक्षेपण)

🔹 Concept:

इसमें object को Third Quadrant में रखा जाता है,
यानि कि object Plane के पीछे और नीचे होता है।

Observer → Plane → Object

मतलब: देखने वाले की नज़र और ड्रॉइंग शीट के बीच plane होता है, और object उसके पीछे।


🔹 View Arrangement (दृश्यों की स्थिति):

View Typeकहाँ बनेगा (Drawing Sheet पर)
Front ViewCenter में
Top ViewFront View के ऊपर
Right Side ViewFront View के दाएँ

🔹 पहचान का Symbol:

उसी Truncated Cone Symbol में
बड़ा सर्कल दाएँ और छोटा सर्कल बाएँ होता है।
यह दर्शाता है कि यह Third Angle Projection है।


दोनों के बीच मुख्य अंतर (Difference Table)

विशेषता1st Angle Projection3rd Angle Projection
QuadrantFirst QuadrantThird Quadrant
View की स्थितिTop view नीचे बनती हैTop view ऊपर बनती है
Side view की स्थितिRight view बाएँ बनती हैRight view दाएँ बनती है
Object और Plane का संबंधObject Plane के सामनेObject Plane के पीछे
Rule Symbolबड़ा सर्कल बाएँबड़ा सर्कल दाएँ
Common inIndia, Europe (ISO standard)USA, Canada (ANSI standard)
Drawing sheet में देखने का तरीकाView उलट दिशा में रखे जाते हैंView उसी दिशा में रखे जाते हैं
Visualizationथोड़ा complexआसान और intuitive

How to Draw Step-by-Step (According to BIS/ISO Rule)

✳ Step 1: Draw Reference Line (XY Line)

Horizontal line बनाइए —
इसके ऊपर Front View और नीचे या ऊपर (projection system के अनुसार) Top View बनेगा।


✳ Step 2: Draw Front View

  • ऑब्जेक्ट को सामने से देखें।
  • इसकी ऊँचाई और चौड़ाई से Front View बनाइए।

✳ Step 3: Draw Top View

  • ऊपर से देखकर projection नीचे (1st angle) या ऊपर (3rd angle) ड्रॉ करें।
  • Projection lines (light thin lines) का उपयोग करें।

✳ Step 4: Draw Side View

  • Front View से 45° की projector line खींचें।
  • इससे Side View की ऊँचाई और चौड़ाई match करें।
  • Side View 1st angle में बाएँ, और 3rd angle में दाएँ बनेगा।

✳ Step 5: Dimensioning

  • Dimension lines parallel to view edges होनी चाहिए।
  • Use ISO/BIS dimensioning standard (SP 46:2003).

✳ Step 6: Projection Symbol

  • Right bottom corner में proper projection symbol डालें
    (यह बताता है कि drawing 1st angle है या 3rd angle)।

Professional Tips

✅ Always write projection type on title block —
“Projection: First Angle” or “Projection: Third Angle”

✅ Projection lines thin और construction lines faint रखें।
✅ Visible edges dark lines (thick continuous) से बनाएं।
✅ Hidden edges dashed lines से बनाएं।
✅ Center lines chain-dash से बनाएं।
✅ Always use proper scaling and labeling.


आसान याद रखने का तरीका

  • 1st Angle → Front के नीचे Top View
  • 3rd Angle → Front के ऊपर Top View
  • 1st Angle → Right View बाएँ
  • 3rd Angle → Right View दाएँ

👉 बस इतना याद रखिए, तो कभी गलती नहीं होगी।


निष्कर्ष (Conclusion)

बिंदुसारांश
Orthographic Projection3D ऑब्जेक्ट को 2D में दिखाने की तकनीक
1st Angle ProjectionISO/BIS Standard (India/Europe में प्रचलित)
3rd Angle ProjectionANSI Standard (USA/Canada में प्रचलित)
DifferenceTop और Side views की स्थिति में अंतर
Drawing RuleISO Symbol, Reference Line, Dimensions के अनुसार

Isometric और Orthographic Projection को आसान भाषा में

सबसे पहले समझो – ये दोनों क्या होते हैं

आइसोमेट्रिक प्रोजेक्शन (Isometric Projection) और ऑर्थोग्राफिक प्रोजेक्शन (Orthographic Projection) — दोनों ही तकनीकी ड्रॉइंग में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

  • आइसोमेट्रिक प्रोजेक्शन किसी वस्तु को तीन आयामों (3D) में दिखाता है, जहाँ तीनों अक्ष (X, Y, Z) समान कोण पर दिखाई देते हैं। यह ऑब्जेक्ट का वास्तविक आकार और रूप समझने में मदद करता है।
  • ऑर्थोग्राफिक प्रोजेक्शन वस्तु के विभिन्न दृश्य (2D Views) जैसे — Front View, Top View, Side View प्रस्तुत करता है, जिससे सटीक माप और निर्माण जानकारी मिलती है।

ड्रॉइंग बनाते समय कुछ सावधानियाँ ज़रूरी हैं — जैसे कोण सही रखना (30°)प्रोजेक्शन लाइनें समान रखनासही स्केल का उपयोग करना, और छिपी रेखाएँ (Hidden Lines) ठीक ढंग से दिखाना।

1. Isometric Projection (आइसोमेट्रिक प्रोजेक्शन)

यह एक 3D (त्रिआयामी) ड्राइंग होती है जिसमें किसी ऑब्जेक्ट को ऐसे दिखाया जाता है कि उसके तीनों साइड (लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई) बराबर रूप से दिखाई दें

Isometric Projection
  • इसमें तीन एक्सिस होती हैं:
    ➤ X-axis (30° दाएँ)
    ➤ Y-axis (30° बाएँ)
    ➤ Z-axis (ऊपर की ओर)

 इससे ऑब्जेक्ट थोड़ा झुका हुआ लगता है, और हम उसे 3D में “महसूस” कर सकते हैं।

2. Orthographic Projection (ऑर्थोग्राफिक प्रोजेक्शन)

यह 2D (दो आयामी) व्यू होता है। इसमें ऑब्जेक्ट के विभिन्न साइड को अलग-अलग दिखाया जाता है — जैसे:

  • Front View (सामने से)
  • Top View (ऊपर से)
  • Side View (बगल से)

 यह इंजीनियरिंग ड्रॉइंग या मशीन पार्ट्स बनाने में बहुत जरूरी होता है।

अब सीखो – इसे आसान तरीके से कैसे बनाएं

Isometric Projection आसान तरीका:

  1. सबसे पहले पेज पर 30° के दो लाइनें बनाओ (एक दाईं ओर, एक बाईं ओर)।
  2. बीच में एक वर्टिकल लाइन (ऊँचाई) बनाओ।
  3. अब अपने ऑब्जेक्ट के माप (length, width, height) के अनुसार लाइनें खींचो।
  4. सभी को जोड़ो — तुम्हारा ऑब्जेक्ट 3D दिखने लगेगा।
  5. अंदर की डिटेल दिखानी है तो faint lines (हल्की रेखाएँ) इस्तेमाल करो।

 टिप:

  • हमेशा 30° सेट स्केल का प्रयोग करो।
  • लाइनों को साफ और हल्का रखो ताकि गाइड लाइन्स मिटाई जा सकें।
  • पहले क्यूब या बॉक्स बनाना प्रैक्टिस करो, फिर कॉम्प्लेक्स शेप्स बनाओ।

Orthographic Projection आसान तरीका:

  1. एक सादा राइट-एंगल बॉक्स बनाओ (3 व्यूज़ के लिए जगह)।
  2. ऊपर की जगह में Top View, बीच में Front View, और साइड में Side View बनाओ।
  3. हर व्यू को एक-दूसरे से प्रोजेक्शन लाइन से जोड़ो।
  4. सब व्यूज़ को सही प्रपोर्शन में रखो।

टिप:

  • हर व्यू की लाइनें समान रूप से मिलनी चाहिए।
  • Hidden lines (डॉटेड) से अंदर के हिस्से दिखाओ।
  • पहले हमेशा Front View से शुरू करो, फिर Top और Side बनाओ।

याद रखने योग्य बातें:

  • Isometric = 3D Look
  • Orthographic = Real technical drawing
  • Isometric को समझना आसान, Orthographic से माप निकालना आसान
  • Practice is key  – रोज़ 1-2 ड्रॉइंग बनाओ

 Isometric और Orthographic Projection बनाते समय ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण सावधानियाँ (Precautions) दी गई हैं 👇

आइसोमेट्रिक प्रोजेक्शन (Isometric Projection) बनाते समय सावधानियाँ:

  1. कोण सही रखें (30°): हमेशा सेट स्क्वेयर या ड्राफ्टिंग मशीन से दोनों ओर 30° के कोण बनाएं। अनुमान से लाइन न खींचें।
  2. स्केल एडजस्ट करें: Isometric ड्रॉइंग में actual scale नहीं बल्कि isometric scale (0.816) इस्तेमाल होता है।➤ मतलब: 100mm की लंबाई ड्रॉइंग में 81.6mm होगी।
  3. लाइनें हल्की खींचें (Construction Lines): शुरुआत में सभी गाइड लाइनें बहुत हल्की बनाएं ताकि बाद में साफ-साफ मिटाई जा सकें।
  4. समान माप रखें: X, Y, और Z तीनों दिशाओं में समान माप रखें वरना ड्रॉइंग तिरछी या विकृत लगेगी।
  5. साफ-सुथरी लाइनें बनाएं: सभी मुख्य लाइनें गहरी और सीधी बनाएं ताकि ऑब्जेक्ट 3D और क्लियर दिखे।
  6. अंदर की लाइनें (Hidden edges) केवल ज़रूरत हो तभी दिखाएं। बहुत ज़्यादा दिखाने से चित्र भ्रमित कर सकता है।

ऑर्थोग्राफिक प्रोजेक्शन (Orthographic Projection) बनाते समय सावधानियाँ:

  1. व्यू का सही क्रम रखें: पहले Front View, फिर Top View, और उसके बाद Side View बनाएं।
  2. Projection Lines सीधी और समान रखें: व्यूज़ को जोड़ने वाली projection lines सीधी और parallel होनी चाहिए।
  3. समान माप (Proportion): तीनों व्यू एक-दूसरे से perfectly align होने चाहिए — ताकि एक व्यू का आकार दूसरे में मेल खाए।
  4. Hidden Lines (छिपी रेखाएँ): अंदर के हिस्से दिखाने के लिए dotted lines का प्रयोग करें। लेकिन बहुत अधिक न बनाएं।
  5. Labels और Dimensions: हर व्यू को label करें — जैसे Front View (FV), Top View (TV), Side View (SV)। Dimension lines को thin और neat रखें।
  6. Line Type और Weight: Visible edges → dark continuous line Hidden edges → dotted line Center lines → long-short-long dash
Bonus Tips:
  • हमेशा शुरुआत पेंसिल (HB या 2H) से करें।
  • रबर से मिटाने के बाद ड्रॉइंग पेपर पर दाग न पड़ें।
  • Scale और Protractor का सही प्रयोग करें।
  • Practice daily with simple shapes like cube, cone, cylinder.
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ITI CBT Exam Important Date Time Table 2024

ITI CBT Exam 2024 Exam Schedule Time Table 2024 Now out Check Complete Post for know Exam Fees Date ITI Exam Date Exam Schedule Etc. Tentative schedule for Craftsman Training Scheme (CTS) All India Trade Test- 2024 (Mains Examinations) for the sessions 2022-24(2nd Year of two-year course), 2023-25(1st Year of two-year course) and 2023 -24 (one-year course and six months courses (batch l& )) for regular and private trainees is as follows. It is informed that all the examination processes for all sessions (from eligibility creation to result publication) will be carried out on examination module being newly developed on the Skill India Digital Hub (SIDH) Portal.

ITI Exam Schedule 2024 Official Notice

DGT has issued an official notice and published the notice of the date of the upcoming examination and complete information about fee payment, which you can see by clicking on the link given below. According to the official notice, the starting date for fee payment is from 30 June 2024 to 13 July 2024 and the mapping center for practical exam is from 13 July to 16 July and if we talk about CBT exam, then it is from 7 August 2024 to 27 August 2024, the result will be published on 5 September 2024.

Trainee Eligibility and Exam Fees Activity Schedule 2024

EventImportant Date
Formative Assessment Marks Upload30/06/2024 – 08/07/2024
Attendance Upload30/06/2024 – 08/07/2024
Practical Exam Fee Status Update30/06/2024 – 13/07/2024
CBT Exam Fee Submission30/06/2024 – 13/07/2024

ITI Practical Examination Activity Schedule 2024

ITI Practical Exam Date between 01/08/2024 – 05/08/2024 More information Please See Below

EventImportant Date
Practical Exam Center Mapping13/07/2024 – 16/07/2024
Practical Examiner Registration & district preference update30/07/2024 – Onwards
Practical Examiner Mapping and Approval16/07/2024 – 30/07/2024
Practical Hall Ticket Download17/07/2024 – 05/08/2024
Practical Examinations01/08/2024 – 05/08/2024
Practical Mark Entry01/08/2024 – 07/08/2024
Entered Practical Mark Approval by Nodal ITI01/08/2024 – 15/08/2024
Entered Practical Mark Approval by State01/08/2024 – 20/08/2024

ITI CBT Exam Date 2024

EventImportant Date
CBT Exam Center Mapping14/07/2024 – 28/07/2024
ITI CBT Exam Admit Card Download01/08/2024 – 27/08/2024
ITI CBT Exams Date07/08/2024 – 27/08/2024

ITI Result Declared Date 2024

EventDate
Result publication05/09/2024

Download Exam Schedule Official Notice PDF 2024

The dates of ITI practical exam or CBT exam or admit card have been released and I have shown all the dates in detail in the post above. If you want to download the official notification also, then I am giving you the link below. You can download the official notification by clicking on the click here below.

ITI Exam Schedule 2024
NotificationLink
Download Exam Schedule NoticeClick Here

Motor Star and Delta Connection Hindi

हम किसी भी थ्री-फेज मोटर का कनेक्शन करते हैं तो हम दो तरीके से करते हैं या तो हम उसको स्टार कनेक्शन Star Connecion में जोड़ेंगे या फिर हम उसको डेल्टा कनेक्शन Delta Connection में जोड़ेंगे आज इस पोस्ट के अंदर मैं आपको यही डाउट क्लियर करूंगा कि हम मोटर का स्टार कनेक्शन कब करते हैं और कब हम उस मोटर का डेल्टा कनेक्शन करते हैं

स्टार कनेक्शन एंड डेल्टा कनेक्शन कैसे किया जाता है

How to make star connection of Motor

Motor Star Connection

स्टार कनेक्शन और डेल्टा कनेक्शन कैसे किया जाता है काफी सिंपल होता है दोस्तों हमारी मोटर के अंदर जैसे ये छह टर्मिनल होते हैं एक 2 3 4 5 6 ये छह टर्मिनल है अगर हम 6 5 4 के तीनों पॉइंट को शॉर्ट कर देते हैं तीनों को यानी एक से जोड़ देते हैं और इधर हम दे देते हैं R,Y,B मतलब तीन Phase दे दिए तो उसे स्टार कनेक्शन कहते है| स्टार कनेक्शन में जो 3 टर्मिनल 4 5 6 को हमने शार्ट किया था वही हमारी नूट्रल टर्मिनल होती है इससे मोटर के प्रत्येक टर्मिनल में 220 वोल्ट की है सप्लाई रहती है|

How to make Delta connection of Motor

Motor Delta Connection

डेल्टा कनेक्शन जिसके अंदर हम क्या करते हैं Star Connection जैसे हमने R Y B दिया ठीक उसी प्रकार से इधर हमने R Y B दिया लकिन इधर हम क्या करेंगे इधर भी हम फेस ही देंगे इधर हम तीन ऐसे पत्ती लगा देते हैं जैसे टर्मिनल 6 को 1 से शार्ट कर देते है टर्मिनल 5 को 2 से और टर्मिनल 4 को 3 से ऐसे में क्या होता है की प्रत्येक वाइंडिंग के दोनों टर्मिनल में हम फेज की सप्लाई देते है और मोटर के हर टर्मिनल में 440 वोल्ट की सप्लाई मिलती है जैसा की मैंने आप को चित्र में दिखाया है की मोटर की वाइंडिंग और टर्मिनल से कैसे जुडी होती है

स्टार कनेक्शन और डेल्टा कनेक्शन कब करना चाहिए?

स्टार कनेक्शन (Y) और डेल्टा कनेक्शन (∆) दोनों ही तीन फेज की बिजली सप्लाई को मोटर या अन्य तीन फेजी उपकरणों से कनेक्ट करने के तरीके हैं, लेकिन इन दोनों में थोड़ा अंतर होता है। आपको किस कनेक्शन को करना है, यह आपके उपयोग के आधार पर निर्भर करता है।

स्टार कनेक्शन

साधारण या हलके लोड

  • अगर आपके पास हल्का लोड या साधारण उपयोग के लिए मोटर है, तो आमतौर पर स्टार कनेक्शन उपयोगी होती है।
  • इसमें प्राथमिक वाइंडिंग और स्टार्टिंग वाइंडिंग को पैरालल कनेक्ट किया जाता है।

डेल्टा कनेक्शन

उच्च लोड के लिए

  • अगर आपका मोटर हाई पावर या उच्च लोड में काम कर रहा है, तो डेल्टा कनेक्शन करना चाहिए ।
  • इसमें प्राथमिक और स्टार्टिंग वाइंडिंग को सीरियल कनेक्ट किया जाता है।
  • डेल्टा कनेक्शन के लिए कंपेक्ट वायरिंग की आवश्यकता होती है, जो उच्च पावर उपयोग के लिए उपयुक्त होता है।
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DGT AITT CITS Supplementary Exam Time Table 2024

DGT has released the AITT CITS Supplementary exam schedule 2024 according to which the registration will start from 29/01/2024 talking about the exam, the engineering drawing exam will start from 20th February 2024 and the last date of the exam has been fixed till 28th February 2024. For more information please read the post below carefully

DGT AITT CITS Exam Schedule TimeTable 2024

AITT CITS Exam Schedule 2024

Sl. No.ActivityTentative Dates
1.Registration of trainees and Examination Fee29.01.2024 to 06.02.2024
2.Exam centre Mapping for Practical, Engineering Drawing07.02.2024 to 09.02.2024
3.Generation of Hall Tickets10.02.2024 to 12.02.2024
4Downloading of Hall Tickets by Candidates through NIMI Portal12.02.2024 onwards
5Engineering Drawing/Soft Skills (Practical)20.02.2024
7Trade Practical21.02.2024 & 22.02.2024
8Training Methodology (Practical)23.02.2024 & 24.02.2024
9CBT Examination (Online mode)27.02.2024 & 28.02.2024
10Uploading/Compiling of Online exam marks, Practical and Engineering Drawing marks by the NIMIUp to 31.03.2024
11Declaration of Final result08.04.2024
AITT CITS Supplementary Exam Schedule 2024

AITT CITS Supplementary Exam Time Table 2024

DATETIMEACTIVITY
20.02.202409.30 AM to 12.30 PMEngineering Drawing* All Trades
20.02.202402.30 PM to 05.30 PMSoft Skills Practical
21.02.2024
(Wednesday)
&
22.02.2024
(Thursday)
09.30 AM to 06.00 PMTrade Practical
23.02.2024
(Friday)
&
24.02.2024
(Saturday)
09.30 AM to 06.00 PMTraining Methodology (Practical)
27.02.2024
(Tuesday)
&
28.02.2024
(Wednesday)
09.30 AM to 06.00 PMOnline examination for Theoretical Subjects(Trade Theory, Workshop Calculation & Science, Workshop Calculation, Workshop Science, Soft Skills, and Training Methodology) Time and venue of Examination Centres etc. will be printed on the Hall Ticket
AITT CITS Exam 2024 Exam Time Table

Underground Cable Classification and Types

आज के पोस्ट में हम जानेगे की केबल कितने प्रकार के होते है और उनका क्या प्रयोग है और भूमिगत केबल के लाभ और हानि के बारे में भी जानेगे

भूमिगत केबल किसे कहते है

जिन केबल को जमीन के नीचे स्थापित किया जाता है उन्हें भूमिगत केबल कहा जाता है , जिसका उपयोग बिजली या संचार संकेतों को प्रसारित करने के लिए किया जाता है। इसकी खासियत यह है की यह सुरक्षा, के साथ ही साथ जमीन के अंदर होने के कारण सुंदरता भी बानी रहती है और स्थान भी नहीं घेरती है जिसके वजह से शहरी क्षेत्रों में इसे काफी प्रयोग किया जाता है । ये केबल विशिष्ट प्रयोग और आवश्यकताओं के आधार पर वोल्टेज, निर्माण और इन्सुलेशन में भिन्न हो सकते हैं।

भूमिगत केबलों का वर्गीकरण

भूमिगत केबलों को उनके अनुप्रयोग, निर्माण और इन्सुलेशन सामग्री सहित विभिन्न मानदंडों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। यहां कुछ सामान्य वर्गीकरण दिए गए हैं:

  • अनुप्रयोग के आधार पर
  • वोल्टेज स्तर के आधार पर
  • निर्माण के आधार पर
  • इन्सुलेशन प्रकार के आधार पर
  • संरक्षण के आधार पर
  • इंस्टॉलेशन विधि के आधार पर
  • अग्नि छमता के आधार पर

अनुप्रयोग के आधार पर (Types of Application)

अनुप्रयोग के आधार पर केबल दो प्रकार के होते है

पावर केबल (Power Cable)

Underground Power Cable

विद्युत शक्ति को वितरित करने के लिए इसको डिज़ाइन किया गया। इनका उपयोग आमतौर पर आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली वितरण के लिए किया जाता है।

संचार केबल (Communication Cable)

Underground Communication Cable

सिग्नल और डेटा संचारित करने के लिए इसे बनाया जाता है। इस श्रेणी में टेलीफोन केबल, फाइबर ऑप्टिक केबल और डेटा संचार के लिए उपयोग की जाने वाली अन्य केबल शामिल हैं।

वोल्टेज के आधार पर

कम वोल्टेज (LV) केबल:
आमतौर पर आवासीय और वाणिज्यिक अनुप्रयोगों में 1 केवी तक के वोल्टेज के लिए उपयोग किया जाता है।
मध्यम वोल्टेज (MV) केबल:
1 केवी से 33 केवी तक के वोल्टेज के लिए डिज़ाइन किया गया है और आमतौर पर स्थानीय बिजली वितरण के लिए उपयोग किया जाता है।
उच्च वोल्टेज (HV) केबल:
33 केवी से ऊपर के वोल्टेज के लिए उपयोग किया जाता है। इन केबलों का उपयोग अक्सर लंबी दूरी की बिजली ट्रांसमिशन के लिए किया जाता है।
अत्यधिक उच्च तनाव (EHT)केबल:
66 केवी से ऊपर के वोल्टेज के लिए उपयोग किया जाता है।
अतिरिक्त सुपर वोल्टेज (XLPE) केबल:
इनका उपयोग 132 केवी से ऊपर वोल्टेज आवश्यकता वाले अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है।

निर्माण के आधार पर

सिंगल-कोर केबल्स

Underground Single Core Cable

इसमें एक सिंगल कंडक्टर होता है जो इन्सुलेशन और अन्य परतों से घिरा होता है।

मल्टी-कोर केबल

Underground MultiCore Cable

एक ही इन्सुलेशन के भीतर कई कंडक्टर होते हैं, जिनका उपयोग अक्सर तीन-चरण बिजली प्रणालियों के लिए किया जाता है।

इन्सुलेशन प्रकार के आधार पर

पेपर-इंसुलेटेड केबल:

Paper Cover Underground Cable

ऐतिहासिक रूप से सामान्य, ये केबल इन्सुलेशन सामग्री के रूप में कागज का उपयोग करते हैं।
पॉलीमेरिक-इंसुलेटेड केबल्स:

Polymeric-Insulated Cables

इन्सुलेशन के लिए क्रॉस-लिंक्ड पॉलीथीन (एक्सएलपीई) या एथिलीन प्रोपलीन रबर (ईपीआर) जैसी सामग्री का उपयोग करते है। ये अपने बेहतर गुणों के कारण आधुनिक प्रतिष्ठानों में अधिक प्रयोग किये जाते हैं।
तेल-भरे केबल:

उच्च-वोल्टेज अनुप्रयोगों के लिए उपयोग किया जाता है, इन केबलों को उच्च कार्यछमता बढ़ाने के लिए इन्सुलेट तेल से भरा जाता है।

संरक्षण के आधार पर

स्क्रीनयुक्त या संरक्षित केबल

स्क्रीन वाली या परिरक्षित केबल में विद्युत चुम्बकीय हस्तक्षेप से सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त परत होती है, जो डेटा ट्रांसमिशन जैसे अनुप्रयोगों में सिग्नल एकाग्रता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। संरक्षित धात्विक या अधात्विक हो सकता है।

अनस्क्रीन या बिना असंरक्षित केबल

एक बिना संरक्षित केबल में विद्युत चुम्बकीय इंटरफ़ेस (ईएमआई) या रेडियोफ्रीक्वेंसी इंटरफ़ेस (आरएफआई) से सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त परत का अभाव होता है। आमतौर पर कम जोखिम वाले अनुप्रयोगों में उपयोग किया जाता है जहां इसकी सादगी और कम लागत के कारण इंटरफ़ेस न्यूनतम होता है। हालाँकि, यह बाहरी हस्तक्षेप के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है

इंस्टॉलेशन विधि के आधार पर

प्रत्यक्ष दफन केबल:
नाली या नलिकाओं के उपयोग के बिना सीधे भूमि में स्थापित किया जा सकता है ।

नलिकाओं या नाली में केबल:
अतिरिक्त यांत्रिक सुरक्षा और रखरखाव में आसानी प्रदान करने के लिए केबलों को सुरक्षात्मक नाली के भीतर रखा जाता है।

अग्नि छमता के आधार पर

अग्नि प्रतिरोधी केबल:
आग के दौरान कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसका उपयोग अक्सर आपातकालीन प्रकाश व्यवस्था और निकासी प्रणालियों जैसे महत्वपूर्ण अनुप्रयोगों में किया जाता है।

गैर-अग्नि-प्रतिरोधी केबल:
विशिष्ट अग्नि-प्रतिरोधी गुणों के बिना मानक केबल।

केबल के प्रकार और अधिकतम कार्य तापमान

Cable TypeMax Operating Temperature
XLPE (Cross-Linked Polyethylene) Underground CablesUp to 90°C (194°F) or 105°C (221°F)
EPR (Ethylene Propylene Rubber) Underground CablesUp to 90°C (194°F) or 105°C (221°F)
MI (Mineral-Insulated) Underground CablesUp to 250°C (482°F) for standard applications; higher for specialized versions
PILC (Paper-Insulated Lead-Covered) Underground CablesUp to 70°C (158°F) for standard applications
PVC (Polyvinyl Chloride) Underground CablesUp to 70°C (158°F) for general-purpose PVC insulation; up to 90°C (194°F) for heat-resistant variants
HDPE (High-Density Polyethylene) Underground CablesUp to 75°C (167°F) to 90°C (194°F) depending on specific formulation

भूमिगत केबल के फायदे और नुकसान

भूमिगत केबलों के लाभ

  • भूमिगत केबल जमीन के ऊपर दिखाई नहीं देते हैं, जो स्वच्छ और सुन्दर लगता है
  • भूमिगत केबलों पर वातावरण का कम प्रभाव पड़ता है, जिससे हर ऋतू में निरंतरता बनी रहती है
  • भूमिगत केबल कम विद्युत चुम्बकीय इंटरफ़ेस प्रदर्शित करते हैं, जो उन्हें आवासीय पड़ोस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए उपयुक्त बनाते हैं।
  • भूमिगत केबल तूफान, तेज़ हवाओं और बर्फ जमाव जैसे मौसम संबंधी व्यवधानों के प्रति कम संवेदनशील होते हैं, जिससे विश्वसनीयता बढ़ जाती है।
  • भूमिगत केबलों पर आकस्मिक संपर्क कम होता है, जिससे गिरी हुई लाइनों के कारण क्षति का खतरा कम हो जाता है।
  • भूमिगत केबलों को आम तौर पर ओवरहेड लाइनों की तुलना में कम रखरखाव की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे पर्यावरणीय तत्वों के संपर्क में कम आते हैं।
  • भूमिगत केबलों का जीवनकाल ओवरहेड लाइनों की तुलना में अधिक हो सकता है क्योंकि वे वातावरण जटिलता से सुरक्षित रहते हैं।
  • ओवरहेड लाइनों की तुलना में भूमिगत केबलों में आमतौर पर कम ट्रांसमिशन हानि होती है, जिससे अधिक कुशल बिजली ट्रांसमिशन होता है।
  • सीमित स्थान वाले शहरी क्षेत्रों में भूमिगत केबल फायदेमंद हो सकते हैं, जिससे भूमि उपयोग पर संघर्ष कम हो सकता है।

भूमिगत केबल के नुकसान

  • खुदाई और विशेष उपकरणों की आवश्यकता के कारण भूमिगत केबलों की स्थापना ओवरहेड लाइनों की तुलना में अधिक महंगी है।
  • भूमिगत केबलों में खराबी तक पहुंचना और उसकी मरम्मत करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे रखरखाव के दौरान लंबे समय तक काम करना पड़ता है।
  • ओवरहेड लाइनों की तुलना में भूमिगत केबल सिस्टम का विस्तार या उन्नयन अधिक कठिन और महंगा हो सकता है।
  • भूमिगत केबलों में गर्मी निकासी की समस्या हो सकती है, विशेष रूप से घनी आबादी वाले क्षेत्रों में, जिससे कार्यक्षमता कम हो सकती है।
  • भूमिगत केबलों में दोषों की पहचान करने और उनकी मरम्मत करने में ओवरहेड लाइनों में समस्याओं को ठीक करने की तुलना में अधिक समय लग सकता है, जिससे सिस्टम का डाउनटाइम प्रभावित होता है।
  • ओवरहेड लाइनों की तुलना में भूमिगत केबलों की निगरानी और दोषों का पता लगाना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • भूमिगत केबल स्थापित करने के लिए आवश्यक खुदाई से पर्यावरणीय प्रभाव पड़ सकता है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र बाधित हो सकता है।
  • भूमिगत केबलों को पानी से क्षति होने की आशंका होती है, जो तब हो सकती है जब केबल इन्सुलेशन उत्तम प्रकार का न किया गया हो।
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