व्हीटस्टोन सेतु सिद्धांत क्या है सूत्र सहित व्याख्या in Hindi

इंग्लैंड के विज्ञानिक प्रोफेसर व्हीटस्टोन ने प्रतिरोध की एक विशेष व्यवस्था का आविष्कार किया जिसके द्वारा किसी चालक का प्रतिरोध ज्ञात किया जा सकता है इस व्यवस्था को व्हीटस्टोन सेतु (Wheatstone Bridge) या मीटर सेतु कहते हैं|

व्हीटस्टोन सेतु सिद्धांत

व्हीटस्टोन सेतु या मीटर सेतु में चार प्रतिरोधों को श्रेणी क्रम में जोड़कर एक चतुर्भुज बनाते हैं इस चतुर्भुज के एक विकर्ण में धारामापी तथा दूसरे विकर्ण मे एक सेल जोड़ देते हैं अब यदि चतुर्भुज के चारों भुजाओं के प्रतिरोध को इस प्रकार समायोजित किया जाए कि सेल द्वारा सेतु में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर धारामापी में कोई विक्षेप ना हो तो सेल को संतुलित कहा जाता है इस स्थिति में चतुर्भुज की किन्ही दो संलग्न भुजाओं के प्रतिरोध का अनुपात शेष तो संलग्न भुजाओं में लगे प्रतिरोध के अनुपात के बराबर होता है|

मीटर सेतु का सिद्धांत क्या है सूत्र सहित व्याख्या

चित्र में चार प्रतिरोध P Q R S चतुर्भुज A B C D के चार भुजाओं के रूप में जुड़े हैं B तथा Dके बीच एक सुराही धारामापी तथा A और C के बीच में एक सेल लगा है K1 और K2 दो कुंजियां जब कुंजी K1 को दबाकर सेल से धारा i प्रवाहित की जाती है तो बिंदु A पर यह धारा दो भागों में बट जाता है एक भाग i1भुजा AB मैं दूसरा भाग i2 भुजा AD में प्रवाहित होता है प्रतिरोधों P,Q,R,S के मान इस प्रकार समायोजित किए जाते हैं कि K2 को दबाने पर धारामापी G मैं कोई भी विक्षेप ना हो स्पष्ट है कि इस दशा में विकर्ण BD में कोई धारा नहीं होगी अतः भुजा BC मैं वही धारा i1 होगी जो भुजा AB में है, तथा भुजा DC में वही धारा i2 होगी जो AD भुजा में है |

व्हीटस्टोन सेतु सिद्धांत सूत्र

कुंजी K2 दबाने पर भुजा BD में धारा नहीं होती | बंद पाश ABDA के लिए किरचॉफ का दूसरा नियम लगाने पर,

i1P-i2R = 0 ………(1)

इसी प्रकार बंद पाश BCDB के लिए,

i1Q-i2S = 0 ……….(2)

समीकरण 1 को समीकरण 2 से भाग करने पर,

i1P/i1Q = i2R/i2S

P/Q = R/S

इस सूत्र से स्पष्ट है कि यदि को प्रतिरोधो का P व Q का अनुपात तथा प्रतिरोध R का मान ज्ञात हो तो अज्ञात प्रतिरोध S की गणना की जा सकती है यही कारण है कि P तथा Q भुजाओं को ‘अनुपाती भुजाएं’ भुजा AD को ‘ज्ञात भुजा’ तथा भुजा CD को ‘अज्ञात भुजा’ कहते हैं सेतु के संतुलित होने पर धारामापी तथा सेल की स्थितियों को आपस में बदलने पर सेतु की संतुलन व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता अतः सेतु की BD तथा AC भुजाओं को संयुग्मी भुजाएं कहते हैं|

Some Important Question

व्हीटस्टोन सेतु का आविष्कार किसने किया?

इंग्लैंड के विज्ञानिक प्रोफेसर व्हीटस्टोन ने व्हीटस्टोन सेतु आविष्कार किया|

व्हीटस्टोन सेतु में कितने प्रतिरोध होते है?

व्हीटस्टोन सेतु या मीटर सेतु में चार प्रतिरोधों को श्रेणी क्रम में जोड़कर एक चतुर्भुज बनाते हैं|

Kirchhoff Laws : Current and Voltage Law

वैज्ञानिक किरचॉफ के नियम का उपयोग नेटवर्क परिपथ हो जटिल परिपथ में तुलनात्मक प्रतिरोध ज्ञात करने के हेतु किया जाता है इसके नियमों की सहायता से जटिल बंद परिपथ में अलग-अलग शाखाओं का प्रतिरोध एवं धारा का मान ज्ञात किया जा सकता है कृपया अपने 2 नियम प्रतिपादित किए जो निम्न प्रकार है|

  1. बिंदु नियम या धारा नियम
  2. मैश नियम या वोल्टेज नियम

किरचॉफ का प्रथम नियम (बिंदु या धारा नियम)

किरचॉफ का प्रथम नियम (बिंदु या धारा नियम)
किरचॉफ का प्रथम नियम (बिंदु या धारा नियम)

इस नियम के अनुसार परिपथ में संधि बिंदु पर आने वाली धाराओं वह उस बिंदु से जाने वाली धाराओं का बीजगणित योग्य शून्य के बराबर होता है अर्थात संधि बिंदु पर आने वाली धाराओं का योग संधि बिंदु पर से जाने वाली धाराओं की योग के बराबर होता है चित्रानुसार संधि बिंदु वह पर आने और जाने वाली धाराएं

I1+I4+I5+(-I2)+(-I3)+(I6) = 0

I1+I4+I5-I2+I3+I6 = 0

I1+I4+I5 = I2+I3+I6

आने वाले धाराओं का योग = जाने वाली धाराओं का योग

किरचॉफ का द्वितीय नियम (मैश नियम या वोल्टेज नियम)

किरचॉफ का द्वितीय नियम (मैश नियम या वोल्टेज नियम)
किरचॉफ का द्वितीय नियम (मैश नियम या वोल्टेज नियम)

किरचॉफ के द्वितीय नियम या मेस नियम के अनुसार यदि किसी बंद परिपथ में पृथक पृथक शाखाओं में होने वाले वोल्टेज ड्राप का बीजगणित के योग्य शुन्य होता है|

R1I1+R2I2+R3I3 = 0

  1. समीकरण तैयार करते समय यदि धारा की दिशा में बढ़ रहा हैं तो -ve चिन्ह ने एवं धारा के विपरीत दिशा में बढ़ रहे हैं तो +ve जिन लगाना चाहिए |
  2. वोल्टेज बढ़ रहा हो तो +ve चिन्ह व वोल्टेज में कमी को -ve चिन्ह द्वारा प्रदर्शित किया जाता है|
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Fitter 2nd Year MCQ Set – 3

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Fitter 2nd Year MCQ Set – 2

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Fitter 2nd Year MCQ Set – 1

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जल विद्युत उत्पादन कैसे होता है : कितना लाभ और हानि ?

आईटीआई इलेक्ट्रीशियन थ्योरी के छात्रों को सबसे ज्यादा जरूरी है कि वह विद्युत उत्पादन (Hydro Power Plant) की प्रक्रिया को अच्छे से समझे आज के पोस्ट में हम यहां पर जल विद्युत ऊर्जा संयंत्र के बारे में आपको विस्तार से समझाएंगे एवं इसकी क्रियाविधि भी बताएंगे इस से होने वाले लाभ व हानि के बारे में विस्तृत जानकारी देंगे

क्या आप को पता है विश्व में होने वाले कुल शक्ति उत्पादन का 20 प्रतिशत भाग जल संयंत्र द्वारा प्रदान किया जाता है अतः तापीय शक्ति संयंत्र के बाद शक्ति उत्पादन में जल विद्युत संयंत्र (हाइड्रो पावर प्लांट) का एक महत्वपूर्ण योगदान है|

जल विद्युत उत्पादन कैसे होता है : कितना लाभ और हानि ?
जल विद्युत उत्पादन संयंत्र

हाइड्रो पावर प्लांट क्या है? आइए समझते हैं|

जल विद्युत ऊर्जा का उत्पादन नदियों तथा जिलों में स्वच्छ पानी के भाव से किया जाता है इसके अंतर्गत पानी को उच्च स्थान पर एकत्रित किया जाता है जहां इसके स्थितिज ऊर्जा होती है इस पानी को नीचे की ओर बढ़ाया जाता है जिसके कारण इसके स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है गुरुत्वाकर्षण के कारण पानी का बहाव नीचे की ओर होता है इस बहते हुए पानी में गतिज ऊर्जा होती है जिसका रूपांतरण यांत्रिक ऊर्जा में होता है जल विद्युत शक्ति केंद्रों में इस यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है जल विद्युत केंद्र में विद्युत शक्ति का उत्पादन बहुत ही निम्न दरों पर किया जा सकता है|

हाइड्रो पावर प्लांट का योजनाबद्ध प्रबंधन

हाइड्रो पावर प्लांट के लिए सर्वप्रथम एक नदिया झील पर बांध का निर्माण किया जाता है और भराव क्षेत्र से जल को एकत्रित करके बांध के पीछे जमा किया जाता है ताकि जलाशय बनाया जा सके इस जलाशय से एक दबाओ सुरंग निकाली जाती है और पेनस्टॉक के शीर्ष पर उपस्थित वॉल्व हाउस तक जल को पहुंचाया जाता हैइस वॉल्व हाउस में मुख्य जल गेट व स्वत: पृथककारी वॉल्व होते हैं यह वॉल्व पावर हाउस तक जल के बहाओ पर कंट्रोल करते हैं और जब पेनस्टॉक भर जाता है तो जल की सप्लाई बंद कर लेते हैं इन वॉल्व हाउस से एक बड़े स्टील पाइप जिसे पेनस्टॉक (जलद्वार) कहते हैं के द्वारा जल को टरबाइन तक पहुंचाया जाता है जल टरबाइन जो लिए जलीय ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तित कर देती है इस टरबाइन के द्वारा मुख्य प्रत्यावर्तन को चलाया जाता है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित कर देती है इसमें एक सर्च टैंक भी होता है जिसे वॉल्व हाउस उसके ठीक पहले बनाया जाता है विद्युत लोड ना होने की स्थिति में जब टरबाइन गेट अचानक बंद हो जाते हैं तो पेनस्टॉक को हानि पहुंच सकती है अतिरिक्त जल सर्च टैंक में पहुंचकर पेनस्टॉक को छति होने से बचाया जा सकता है

जल विद्युत के फायदे और नुकसान

जल विद्युत ऊर्जा के लाभ

  1. इसकी बनावट अति सरल रखरखाव बेहद कम ईंधन व्य्य तथा प्रदूषण रहित है|
  2. इसमें सहायक उपकरण तापीय शक्ति स्टेशन की अपेक्षा कम काम आते हैं जिससे लागत में कमी होती है|
  3. चुकी ईंधन व्य्य शुन्य है इसलिए इसे चलाना सस्ता पड़ता है|
  4. जल शक्ति विद्युत संयंत्र की कार्यकारी 100 से 125 वर्ष होती है जबकि तापीय शक्ति स्टेशन में या मात्र 20 से 25 वर्ष की होती है|
  5. चुकी यहां कोई ईंधन उपयोग नहीं होता इसलिए जो दिक्कतें तापीय शक्ति स्टेशनों में आती हैं जैसे धुआँ, राख या प्रदूषण हुआ इस संयंत्र में नहीं होती अर्थात इस संयंत्र से आदमी की सेहत को कोई नुकसान नहीं होता|
  6. यह शक्ति विद्युत संयंत्र विद्युत शक्ति उत्पादन के साथ-साथ सिंचाई के लिए भी पानी उपलब्ध कराते हैं|
  7. इसका चालन बहुत कम होता है जो उपकरण उपयोग में लाए जाते हैं बता भी सकती स्टेशन की तुलना में ज्यादा मजबूत होते हैं तथा कम वेग से (300 – 400 RPM) घूमते हैं जबकि तापीय शक्ति स्टेशन में उपकरण अधिक वेग (3000 – 4000 RPM) से घूमते हैं इसलिए जल विद्युत शक्ति संयंत्र में उपयोग किए जाने वाले उपकरण जल्दी खराब नहीं होते है|
  8. उचित अनुरक्षण होने पर इस शक्ति संयंत्र की दक्षता समय के साथ घटती नहीं है|
  9. इस विद्युत शक्ति संयंत्र में आपाती हानि या नहीं होती हैं|
  10. इस के प्रचलन के लिए अधिक कुशल इंजीनियर और टेक्नीशियनओं की आवश्यकता कम होती है|
  11. यह शक्ति संयंत्र काफी स्वच्छ होता है क्योंकि किसी भी प्रकार के ईंधन का प्रयोग नहीं किया जाता है|
  12. इन सयंत्रो को बिना समय गवाएं तत्काल प्रारंभ किया जा सकता है तथा मात्र 10 से 15 सेकंड में पूर्ण भार अपने ऊपर ले लेती है जिस कारण इस संयंत्र को शिखर भार के लिए भी काम में लिया जाता है|
  13. इन सयंत्रो को दूरदराज के इलाकों में स्थापित करते हैं जहां जमीन सस्ते उपलब्ध होती है|

जल विद्युत ऊर्जा के हानि

  1. इसमें शक्ति उत्पादन पानी की मात्रा पर निर्भर करती है जो कि उस क्षेत्र में हुई वर्षा पर निर्भर करती है इसलिए लंबे सूखे मौसम के कारण शक्ति उत्पादन प्रभावित होती है|
  2. इसके निर्माण मुख्यता बांध के निर्माण में बहुत समय लगता है|
  3. स्थान का चयन पानी के शीर्ष की उपलब्धता के अनुसार किया जाता है और ऐसे स्थान दूरदराज इलाकों में होते हैं जिससे इस संयंत्र की भार केंद्रों से दूरी बढ़ जाती है जिससे संचरण लाइन पर बहुत अधिक खर्च आता है|
  4. बांध मशीनों तथा अन्य उपकरणों को मिलाकर संपूर्ण संयंत्र को खड़ा करने में बहुत खर्चा होता है इन सयंत्रों की प्रति किलो वाट लागत तापीय शक्ति स्टेशनों की तुलना में अधिक होती है|
  5. बांध पर वॉटर हैमर इफेक्ट होता है अगर किसी प्राकृतिक आपदा जैसे भूकंप आदि से बांध टूट जाए तो यह बहुत बड़े क्षेत्र को डुबो सकता है जिससे जन-हानि की संभावना बढ़ जाती है|

भारत के प्रमुख जल विद्युत परियोजना

परियोजना का नामप्रदेशनदीस्थापना
लोअर मेट्टूर जलविद्युत परियोजनातमिलनाडुकावेरी नदी1934
शिवानासमुद्र जलविद्युत परियोजनाकर्नाटककावेरी नदी1902
टिहरी जलविद्युत परियोजनाउत्तराखंडभागीरथी नदी1978
रंजीत सागर जलविद्युत परियोजनापंजाबरावी नदी1981
भाखड़ा नांगल बांध परियोजनाहिमाचल प्रदेशसतलुज नदी1948
बाणसागर जलविद्युत परियोजनामध्य प्रदेशसोन नदी2006
ओंकारेश्वर जलविद्युत परियोजनाओडिशाइंद्रावती नदी1996
हीराकुड जलविद्युत परियोजनाओडिशामहानदी1957
इंदिरा सागर बांध परियोजनामध्य प्रदेशनर्मदा नदी2005
श्रीशैलम जलविद्युत परियोजनाआंध्र प्रदेशकृष्णा नदी1960
सलाल जलविद्युत परियोजनाजम्मू एवं कश्मीरचिनाब नदी1970
सरदार सरोवर बांध परियोजनागुजरातनर्मदा नदी1987
मचकुंड बांध जलविद्युत परियोजनाओडिशामचकुंड नदी1955
शिवानासमुद्र जलविद्युत परियोजनाकर्नाटककावेरी नदी1902
नागार्जुन सागर जलविद्युत परियोजनातेलंगानाकृष्णा नदी1967
रंगीत बांध जलविद्युत परियोजनासिक्किमरंजीत नदी2000
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Fitter First Year Mock Test – Set 10

Most important questions of the Online Computer Based Test for ITI Fitter 1st Year which is completely applicable for all the syllabus. Each sets contains a mix of all questions of ITI Fitter 1st Year which will cover your questions of each chapter and all your questions. Will help you in practice with the help of which you will be able to prepare well for your exam.

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Fitter First Year Mock Test – Set 9

Collection of most important questions of Online Computer Based Test for ITI Fitter 1st Year which is completely applicable for all the syllabus. Each sets contains a mix of all questions of ITI Fitter 1st Year which will cover your questions of each chapter and all your questions. Will help you in practice with the help of which you will be able to prepare well for your exam.

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Fitter First Year Mock Test – Set 8

ITI fitter Online MCQ Mock Test Best Fitter Practice Sets for ITI Online CBT Exam Semester and Yearly First year Candidate Online NIMI Mock Test

ITI Fitter First Year Mock Test
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प्रतिरोध परिभाषा कार्य विधि और कलर कोडिंग

इस पोस्ट में हम जानेंगे कि रेजिस्टेंस कितने प्रकार के होते हैं, यह कैसे काम करता है और रेजिस्टेंस के कलर कोड को कैसे पहचाने की वह कितने ओम का है और रेजिस्टेंस का उपयोग करने का सही तरीका क्या है प्रतिरोध और महत्वपूर्ण विषयों से संबंधित सभी प्रकार के प्रश्न। हम यहां आप सभी से चर्चा करेंगे। प्रतिरोध बहोत ही महत्वपूर्ण विषय है आईटीआई ट्रेड थ्योरी का आइये इसके बारे में विस्तार से समझते है|

प्रतिरोध परिभाषा कार्य विधि और कलर कोडिंग

प्रतिरोध

इस पोस्ट की शुरुआत करने से पहले में आप सभी को बता दू की प्रतिरोध कहते किसे है जब किसी विद्युत परिपथ में विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो यह धारा के प्रवाह का विरोध करती है, किसी पदार्थ का यह गुण “प्रतिरोध” कहलाता है, यह विद्युत ऊर्जा को ऊष्मा में परिवर्तित करता है, इसलिए विद्युत ऊर्जा का मान न्यूनतम होता है। प्रतिरोध की इकाई ओम (Ω) होती है

यदि पदार्थ के सिरों के बीच स्थापित विभवांतर V तथा उसमें प्रवाहित धारा का मान I है तो पदार्थ के प्रतिरोध का मान होगा

R = V/I

यदि पदार्थ के सिरों के बीच विभवांतर 1 वोल्ट हो तथा उसमें से 1 एंपियर की धारा प्रवाहित हो रही है तो पदार्थ का प्रतिरोध का मान एक ओम होगा

ओम के नियमानुसार

1 Ohm = 1volt/1amp

Units of Resistance is,

Ohm = Volt/Amp = Joule/Coulomb/Amp

= (Newton x Meter)/(Amp x Sec.)/Amp

= Kg.M2/Amp2x Second2

Hence, the dimension of resistance =[M1L2T-3A-2]

आइए जानते प्रतिरोध कितने प्रकार के होते हैं ?

प्रतिरोधक को जानने के लिए हम एक चार्ट के जरिए समझ सकते हैं कि प्रतिरोधक कितने प्रकार के होते हैं आइए चार्ट को अच्छे से समझते हैं|

स्थिर मान प्रतिरोध कैसे बनता है और क्या होता है ?

को को बनाने के लिए कार्बन चूर्ण एवं बंधन पदार्थों से बनाए गए पेस्ट को पतले छड़ो के रूप में ढाल दिया जाता है और आवश्यक प्रतिरोध मान के अनुसार छोड़ को टुकड़ों में काट लिया जाता है प्रत्येक टुकड़े के दोनों और एक धात्विक टोपी लगाकर उसे एक संयोजक तार जोड़ दिया जाता है यह संयोजक तार टिन अलोपित तांबे का बना होता है इस प्रकार प्रतिरोधों 1 ओम से 50 किलो ओम तक प्रतिरोधक परास तथा 1/8 से 2 वाट शक्ति परास के बनाए जाते हैं |

परिवर्ती मान प्रतिरोधक क्या होता है ?

परिवर्ती मान प्रतिरोधों को को बनाने के लिए कार्बन चूर्ण एवं बंधक पदार्थों से बनाई गई लई को चंद्राकार पट्टी के रूप में डाल दिया जाता है इस पट्टी को उपयुक्त कुचालक आधार पर कसकर इसके दोनों सिरों पर एक-एक संयोजक जोड़ दिया जाता है पट्टी के ऊपर एक चल भुजा इस प्रकार लगाई जाती है कि उसका संबंध मध्य संयोजक से बना रहे मध्य संयोजक तथा किसी एक सिरे के संयोजक के बीच परिवर्तित प्रतिरोध का मान प्राप्त किया जा सकता है ये प्रतिरोधक 5 ओम से 5 मेगाओम  तक प्रतिरोध परास तथा 0. 05 W से 0. 25 W तक के शक्ति पारस में बनाये जाते है

प्रतिरोधक की कलर कोडिंग

1K ohm Resistor
1 किलो ओम रजिस्टर

बाजारों एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में आपने देखा होगा की तरह तरह के रजिस्टेंस पर तरह-तरह की रंगो की धरियो द्वारा एक कोड किया जाता है आइए समझते हैं कि यह रंगो की धारिया किस प्रकार से किसी प्रतिरोधक का मान को दर्शाते हैं

जिन प्रतिरोधक का आकार बड़ा होता है उन पर उनका मान प्रतिरोधक बॉडी पर प्रिंट कर दिया जाता है परंतु है प्रतिरोधक जिनका आकार बहुत छोटा होता है उन पर प्रतिरोधक के मान को प्रिंट करना आसान नहीं होता साथ ही सर्किट में लगे प्रतिरोधक का मान किसी कारणवश मिट जाने के कारण उनका मान को पढ़ पाना आसान नहीं होता है अतः इन्हीं कारणों से प्रतिरोधक की कलर कोडिंग की आवश्यकता होती है भिन्न-भिन्न उपयोगी विद्युत परिपथों में भिन्न-भिन्न मान के प्रतिरोधक प्रयुक्त किए जाते हैं प्रतिरोधक की कलर कोडिंग निम्न तथ्यों को ध्यान में रखकर की जाती है|

प्रतिरोधक का मान निर्धारण करने के लिए प्रतिरोध की सतह पर चार रंगीन पटिया बनाई जाती हैं जिनमें प्रत्येक पट्टी का विशेष महत्व होता है पहला रंग प्रतिरोधक के सिरे के पास वाले रंग को मानते हैं प्रतिरोधक के सतह पर की गई कलर कोडिंग की सहायता से प्रतिरोधक का मान ज्ञात करने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए|

  • पहला रंग कभी भी काला गोल्ड एंड सिल्वर नहीं होता है|
  • गोल्डन और सिल्वर रंग हमेशा दो या तीन रंगों के पश्चात आते हैं|
  • किसी भी प्रतिरोध का अधिकतम 6 व कम से कम 3  रंग के हो सकते हैं|
  • प्रतिरोधक पर पहला रंग और दूसरा रंग प्रतिरोधक के मान के प्रथम व द्वितीय अंत को दर्शाते हैं|
  • तीसरा रंग गुणांक को व चौथा रंग टोलरेंस को दर्शाता है|
  • यदि प्रतिरोधक पर टोलरेंस की चौथी रंगीन पट्टी नहीं हो तो टोलरेंस 20% माना जाता है|

प्रतिरोध की कलर कोड सारणी

रंगप्रथम पट्टाद्वितीय पट्टातृतीया पट्टा (गुणांक)सहनशीलता (टॉलरेंस)
काला0100
भूरा11101
लाल22102
नारंगी33103
पीला44104
हरा55105
नीला66106
बैंगनी77107
धूसर88108
सफेद99109
सुनहरा10-1± 5%
चांदी10-2± 10%
बिना कलर± 20%

निष्कर्ष

आज के विषय में हमने सीखा प्रतिरोधक किसे कहते हैं वह कितने प्रकार के होते हैं उनके प्रयोग वह प्रतिरोधक से जुड़े महत्वपूर्ण सूत्र साथ ही साथ हम लोगों ने यहां पर प्रतिरोधक के कलर कोड को भी अच्छे से समझा जिससे हमें कभी भी किसी भी प्रतिरोधक को पहचानने में किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना ना करना पड़े आशा करता हूं मेरे द्वारा लिखे गए इस पोस्ट से आपको काफी सहायता प्राप्त होगी यदि किसी भी प्रकार का प्रश्न हो तो आप नीचे कमेंट कर सकते हैं साथ ही साथ हमारे साथ जुड़े फेसबुक पेज को भी फॉलो कर सकते है|

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